महाभारत में शकुनि की द्यूतक्रीड़ा की अहम भूमिका रही है। पांसे फेंकने में उसकी उस्तादी के सभी कायल थे। लेकिन दुर्योधन ने उसका इस्तेमाल कुछ इस तरह किया कि पांडव अपने हक से वंचित हो जाएं और वह आसानी से उनके हिस्से को हड़प ले। जो तर्क दुर्योधन की तरफ से उस समय दिए जा रहे थे, उन पर गौर करना दिलचस्प है।
कौरवों ने युधिष्ठिर को जुआ खेलने के लिए ललकारा। सभी जानते थे कि इस खेल में लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं है। समझदारी का तकाजा था कि युधिष्ठिर इस चुनौती को स्वीकार न करें। मगर शकुनि पांसे फेंकने में कैसे और किस तरह की गड़बड़ी करते हैं, इसके बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं थी, न ही इसका कोई सबूत था कि वे खेल में बेईमानी करते हैं।
लिहाजा, सबकुछ जानते हुए भी युधिष्ठिर बेईमानी का आरोप नहीं लगा सकते थे। और बेईमानी का आरोप लगाए बगैर वे यूं ही जुए की चुनौती लेने से इनकार कर देते तो यह उनके राजधर्म के खिलाफ होता। सो, सच जानते हुए भी वे जुए के जाल में फंसे और न केवल राज्य गंवाया, वनवास को मजबूर हुए बल्कि पत्नी द्रौपदी के अमानवीय अपमान के भी गवाह बने।
दूसरी तरफ कौरवों ने शकुनि के जरिए जुए के नतीजों को कंट्रोल करने की जो व्यवस्था कर रखी थी, वह भले ही बेनकाब न हो सकी हो, उनकी कुटिलता किसी से छिपी न रही। जुए में अपनी ‘जीत’ के बल पर वे अपने हर धतकरम को सही ठहराते रहे। पांडवों के पक्ष में दी गई हर दुहाई के जवाब में उनका तर्क होता कि वे खेल में जीत कर दिखाएं। जब जीत नहीं सकते तो फिर उनकी बातों का कोई मतलब नहीं बनता।
कपट भरी जीत के इस तर्क से राज्य में पांडवों के जायज हिस्से का सवाल गायब हो गया, राजपरिवार की बहू द्रौपदी की मान-मर्यादा, एक स्त्री की गरिमा की भरे दरबार में धज्जियां उड़ाने का पाप भी हवा में उड़ गया। कौरवों ने उस तरफ कान देने की कोई जरूरत महसूस नहीं की। क्यों? बस इसलिए कि पांडव खेल का ‘खेल’ नहीं समझ पाए। वे उस खेल में जीत नहीं सके। लेकिन, यह बात कौरवों को याद नहीं रही कि जो उनके मामा के छल-छद्मों से नियंत्रित खेल को जीत नहीं सका, वह युद्ध में उनके छक्के छुड़ा सकता है। युद्ध में मामा के पांसे काम नहीं आते।
आज जिस तरह की महाभारत में देश फंसा हुआ है, उसमें यह तो सभी समझ रहे हैं कि चुनावी चौपड़ में पांसों का ही कमाल है कि नतीजा एक जैसा आ रहा है। नतीजा देखकर हर बार एक खास पक्ष मुस्कुराता है, दूसरा पक्ष टापता रह जाता है। आलम यह है कि उस पक्ष का आत्मविश्वास आकाश छूता नजर आ रहा है। वह दावा करता है कि दूसरा पक्ष यह खेल कभी जीत नहीं पाएगा। दूसरे पक्ष को कई शुभचिंतक बता रहे हैं कि आप इस खेल से बाहर आ जाएं। इसमें आप जीत नहीं पाएंगे। लेकिन इस पक्ष का ‘राजधर्म’ आड़े आ रहा है।
तो क्या आखिरी फैसला यहां भी ‘युद्ध’ से ही होना तय माना जाए? अगर हुआ तो गांधी के देश में वह कैसा युद्ध होगा?